रविवार, 11 सितंबर 2016

कोई शिकवा नहीं ज़माने से

कोई शिकवा नहीं जमाने से
प्यार बढ़ता है दूर जाने से।

बेवफा है वो, जानता था पर
बाज आया न दिल लगाने से।

रोग है तो दवा जरूरी है
मर्ज़ बढ़ता है और दबाने से।

अपनी परछाइयों से डरता हूँ
डरता हूँ पास उनके जाने से।

हाल इस दौर का कहें क्या अब
चोरियाँ हो रही है थाने से।

होगा मंज़र उजास का हर शूं
एक "दीपक" महज जलाने से।

~लोकेन्द्र मणि मिश्र "दीपक

ग़ज़ल

सोमवार, 5 सितंबर 2016

गुरु

है जो ऊँचा आसमां से और गहरा सिंधु से
जो करे निर्माण जग का इक अकेले बिंदु से

तन हिमालय सा , हृदय गंगा की पावन धार है
वो जगत के हर मनुज के ज्ञान का आधार है।

जिसके सम्मुख देवता भी सिर झुकाते आ रहे हैं
और जिसकी दिव्यता से पार भव के जा रहे हैं

जो खड़ा है बन के पत्थर  नींव का ,संसार के
जिसके सम्मुख हर समस्या हाथ जोड़ी हार के।

कर रहा उनको नमन " दीपक" झुकाए माथ को
और विनती है यही हे नाथ गहिए हाथ को।

~लोकेन्द्र मणि मिश्र "दीपक"