बुधवार, 27 दिसंबर 2017

कल्पना बनाम भोजपुरी बनाम प्रभात खबर

कल्पना बनाम भोजपुरी

भोजपुरी फिल्मों और गानों को अश्लीलता किसी से भी छिपी नहीं है। बेशक़ आज भोजपुरी में कुछ अच्छे काम हो रहे हैं शार्ट फ़िल्म्स के माध्यम से और कुछ संस्थाओं द्वारा सोशल मीडिया में भी प्रयास किये जा रहे हैं लेकिन भोजपुरी की छवि जो पिछले 15-16 सालों में खराब हुई है उसे इतनी जल्दी से नहीं सुधारा जा सकता। भोजपुरी गीत संगीत की जो छवि आज है उसमें कल्पना पटवारी का योगदान अमूल्य है.. गमछा बिछा के दिल मांगना से ले के चढ़ल जवानी रसगुल्ला किसी से भी छिपा नहीं है। आजकल एक वीडियो वायरल हो रहा है जिसमे आपके ही प्रिय दर्शकों ने आपके उन्हीं गीतों को गाने के लिये कहा है और आप उसपे चिढ़ जाती हैं। क्या आपको पता ह उनकी येे फरमाइश आपकी ही देन है । वो भरत शर्मा या शारदा सिन्हा से ये फरमाईस नहीं कर सकते हैं उन्हें मालूम है। आपको व्व उन्हीं गानों के पर्याय के रूप में देखते हैं न कि भिखारी ठाकुर और महेन्दर मिसिर के गीतों के गायिका के रूप में। अपमान किसी का भी नहीं होना चाहिए ये सच है लेकिन यदि उस अपमान का कारण खुद आपके ही द्वारा किये गए कुछ काम हों तो फिर इस अपमान को भी आपको स्वीकारना ही होगा। दूसरी बात ये की अगर आप ये सोच रहीं हैं कि भिखारी ठाकुर के गीतों को गा कर आपके सभी अश्लील गानों के पाप धूल जायेंगे तो आप ये भूल जाईये क्योंकि आपके पुराने गानों के भक्त  आपके इस प्रायश्चित में आपके साथ बिल्कुल भी नहीं हैं।
तीसरी बात प्रभात खबर अखबार के लिये.... पत्रकारिता का पतन तो हम देख ही रहे हैं, टीवी पर समाचारों का मतलब TRP और समाचारपत्रों में खबरों का मतलब  विज्ञापन । इस दौर में आपका अखबार भो क्यों पीछे रहता सो आपने भी बहती गंगा में हाथ धो लिया। आपके खबर की शुरुआत होती है
"कल्पना ने भोजपुरी के लिए जो त्याग किया है वो अतुलनीय है"
क्या इस लाइन का कोई आधार है? या फिर आपको अच्छा लगा इसलिये छाप दिया? खैर केबिन में बैठकर खबर लिखने वाले पत्रकारों और संपादकों से ये गलतियां तो होनी ही है। आपको अगर टेबल पर बैठकर हो पत्रकारिता करनी है तो एक सुझाव है मेरी तरफ से यूट्यूब खोलिये और कल्पना पटवारी सर्च कीजिये फिर आपको पता चलेगा कि कल्पना ने क्या योगदान दिया है। तब आपकी खबर कुछ ऐसा होगी
" कल्पना का भोजपुरी के पतन में अतुलनीय योगदान है"।

धन्यवाद!
लोकेन्द्र मणि मिश्र "दीपक"

गुरुवार, 7 दिसंबर 2017

ज़िन्दगी

एकबार चलि गईल त ना आवेले ज़िन्दगी

खेला अज़ब ग़ज़ब के देखावेले ज़िन्दगी
एक बार चलि गईल त ना आवेले ज़िन्दगी

केतनो अमीर होखे केतनो गरीब होखे
सभकर अईंठि के कान नचावेले ज़िन्दगी।

खोजला प ना किताब में मिले जवन कबो
अदमी के हर ऊ पाठ पढ़ावेले ज़िन्दगी।

नफ़रत के बोरा बान्हि के कुईयाँ में फेंकि द
सबसे करs तूँ प्यार बतावेले ज़िन्दगी।

आइल बा जे ऊ जाई केहूs भुलाय ना
जा-जा के रोज सबके सीखावेले ज़िन्दगी।

~लोकेंद्र मणि मिश्र "दीपक"

बुधवार, 6 दिसंबर 2017

कम से कम रस्ता तो है..

है भले दुश्वार लेकिन कम से कम रस्ता तो है
यूँ दिखाई दे न दे पर ख्वाब में दिखता तो है।

जिसको तुमने ये कहा था लिखना पढ़ना छोड़ तो
शुक्र है वो आदमी छुप- छुप के ही लिखता तो है।

तुम सियासतदां हो फिर अनजान बनते हो मियाँ
इस गली में कोई भी हो आदमी बिकता तो है।

आँधियों में जब मशालें बुझ गईं चारो तरफ
टिमटिमाकर ही सही पर एक दिया जलता तो है।

रहगुज़र को धूप में इस बात से राहत मिली
शाख़ पर का एक पत्ता ही सही हिलता तो है।

~लोकेंद्र मणि मिश्र "दीपक"