शुक्रवार, 18 मई 2018

पतवार छोड़ दोगे तो साहिल न मिलेगा

पतवार छोड़ दोगे तो साहिल न मिलेगा।
अखबार में कातिल कभी कातिल न मिलेगा।

मिल जाये एक बार तो फिर थाम लो उसे
हर बार किसी से ये कभी दिल न मिलेगा।

शब आई है तो आएगी निश्चित ही सहर भी
ये बात सच नहीं है कि झिलमिल न मिलेगा।

सुधियों में तेरे जिस तरह खोया रहा हूँ मैं
हर शख़्स तुम्हे इस क़दर ग़ाफ़िल न मिलेगा।

"दीपक" के हौंसले को डिगा दे कोई तूफां
तूफान कोई इतना तो काबिल न मिलेगा।

~लोकेन्द्र मणि मिश्र "दीपक"

गुरुवार, 26 अप्रैल 2018

तुम मुझको आवाज़ दो तो सही

1रुक के तुम मुझको आवाज दो तो सही।
एक पावन सा अहसास दो तो सही।
मैं जहां हूँ वहीं तुमको ले आऊंगा
अपने आने का आभास दो तो सही।

2 इस जमीं पर ही आकाश मिल जाएगा।
पतझड़ों में भी मधुमास मिल जायेगा।
इश्क़ की गर ख़ुदा सी इबादत करो
आस ही पास वो तुमको मिल जाएगा।

3 एक ऐसी किताब जो जाऊँ।
सूखे दरिया में आब हो जाऊँ।
मुझको ऐसा बना मेरे मौला
उसकी आँखों का ख्वाब हो जाऊँ।

4 उसने कहा जो कुछ तो मैं पागल सा हो गया।
पानी भरे हुए किसी बादल सा हो गया।
दुनिया के रंजो गम से न कुछ भी हुआ मुझे
उसकी बस एक नज़र से ही घायल सा हो गया।

बुधवार, 18 अप्रैल 2018

इश्क़ तो बेज़ुबान है साहब

इश्क़ तो बेज़ुबान है साहब
इसके ना मुंह न कान हैं साहब।

पैर धरती पे हैं भले लेकिन
नापना आसमान है साहब।

घर में गर प्यार ना हो घर कैसा
एक खाली मकान है साहब।

उसकी आवाज़ यूँ लगे है कि
कोई मीठी सी तान है साहब।

पंख से फ़र्क कुछ नही पड़ता
पंख बिन भी उड़ान है साहब।

~लोकेन्द्र मणि मिश्र "दीपक"