सोमवार, 14 जनवरी 2019

मेरी ग़ज़लों से कब गए थे तुम

मैं हूँ अब भी खड़ा उसी रस्ते
जिससे होकर कभी गए थे तुम।

यार छोडो भी वस्ल की बातें
उस समय तो नए नए थे तुम।

एक झटके में रूबरू हो कर
एक झटके में हट गए थे तुम।

मेरी ग़ज़लों में साथ हो मेरे
मेरी ग़ज़लों से कब गए थे तुम।

मैं भी खामोशियों में रहता हूँ
जबसे खामोश हो गए थे तुम।

~लोकेन्द्र मणि मिश्र "दीपक"

लप्रेक: प्रेम में दुनिया

याद है जब अचानक चलते समय तुमने उस जोड़े की तरफ इशारा करते हुए मुझसे कहा था, ये दुनिया प्रेम में ही खूबसूरत लगती है" और मैंने पूछा था  ऐसा क्या है प्रेम में जो दुनिया इतनी खूबसूरत लगने लगती है ? इसके जवाब में तुमने मेरा हाथ पकड़ते हुए कहा था प्रेम खूबसूरत होता है क्योंकि प्रेम में इंसान सिर्फ खूबसूरती देख पाता है जैसे कि इस तस्वीर में तुम देख रहे हो। इस बातचीत में हम भूल गए की ये आखिरी मुलाक़ात थी।
प्रेम के छाँव से निकल कर अपने अपने रास्तों की धूप से अब दोनों को रूबरू  होना था।

Lokendra Mishra
#लप्रेक

रविवार, 13 जनवरी 2019

मेरी ग़ज़लों से कब गए थे तुम

मैं हूँ अब भी खड़ा उसी रस्ते
जिससे होकर कभी गए थे तुम।

यार छोडो भी वस्ल की बातें
उस समय तो नए नए थे तुम।

एक झटके में रूबरू हो कर
एक झटके में हट गए थे तुम।

मेरी ग़ज़लों में साथ हो मेरे
मेरी ग़ज़लों से कब गए थे तुम।

मैं भी खामोशियों में रहता हूँ
जबसे खामोश हो गए थे तुम।

~लोकेन्द्र मणि मिश्र "दीपक"