रविवार, 31 जुलाई 2016

आ जाओ फिर से प्रेमचन्द

मुंशी प्रेमचन्द मेरे प्रिय कहानीकार व् उपन्यासकार हैं।
आज उनके जन्मदिन पर शत् शत् नमन

आ जाओ फिर से प्रेमचन्द

जिसको हरखू भी प्यारा हो
हामिद आँखों का तारा हो
जो गबन लिखे गोदान लिखे
भारत माता की शान लिखे
जो लिखे दर्द हर बुधिया का
निर्धन की टूटी खटिया का
गिल्ली डंडा का खेल लिखे
पूस की रात की झेल लिखे
हाकिम की कड़वी बात लिखे
हर कुरीतियों को घात लिखे

जो रंगभूमि का मंच लिखे
जो परमेश्वर है पंच  लिखे
जो सूद महाजन का लिख दे
जो कजरी सावन का लिख दे

जो नई दिशा दे जन जन को
शब्दों में ढाले हर मन को
हर मन का जो मनमीत बने
जीवन का मधु संगीत  बने
है पुनः जरूरत प्रेमचन्द
आ जाओ फिर से प्रेमचन्द

©लोकेन्द्र मणि मिश्र "दीपक"

बुधवार, 29 जून 2016

ज़िन्दगी तक आ गए

कल सफर हमने शुरू की आखिरी तक आ गये
दोस्ती से चलते - चलते आशिकी तक आ गये।

अब यहाँ  जज़्बात रौशन हो रहे हैं शब्द से
तीरगी को बेधते हम रौशनी तक आ गये।

अच्छे दिन नेताओ के इससे क्या अच्छे आएंगे?
खद्दरों के  छोड़  कुर्ते रेशमी  तक आ गये।

मौत से लड़ता रहा जो आज वो भी खुश दिखा
क्योंकि आखिर मरते -मरते ज़िन्दगी तक आ गये।

© लोकेन्द्र मणि मिश्र "दीपक"

शनिवार, 4 जून 2016

मथुरा काण्ड

जब शाषन लाचार खड़ा हो दुराग्रही हत्यारों से
सिंहासन का गठबंधन जब होता हो गद्दारों से
जब जब जनता वोट बैंक लड़ाई जाती हो
डी एस पी , एस ओ की जब जब बली चढ़ाई जाती हो
याद रखो यादव जी सत्ता छिनने वाली होती है
जनता घट के हर पापों को गिनने वाली होती है।
सत्याग्रह के नाम पे काला धब्बा मथुरा की घटना
खलता है सर्वाधिक सत्ता का डरकर पीछे हटना
यादव जी सुनलो अब भी कर्तव्य निभाना शुरू करो
या जाने के दिन की उल्टी गिनती गिनना शुरू करो
जो भी दोषी हैं उनको पकड़ो फांसी पर लटका दो
जाते -जाते एक बार बस अपराधों को झटका दो
शाम -ए- अवध बनाओ मधुरिम इसमे नही बुराई है
जाकर गाँवों को देखो बिजली दस दिन पर आई है
रोज नए पत्थर लगवाओ राजभवन के सड़को पर
उनकी भी हालत पूछो जो भूखे बैठे सड़को पर।
कम्पेन्सेसन देने वाली नौटँकी को बन्द करो
अपराधी चोरो हत्यारो से खुलकर तुम द्वन्द करो

~लोकेन्द्र मणि मिश्र "दीपक"