रविवार, 2 सितंबर 2018

प्यार ही प्यार- प्यार कान्हा

1- जगत को रस्ता दिखाने आया धरा पे नर रूप धार कान्हा
भक्ति का योग कर्म का योग सिखाने आया था प्यार कान्हा
ये जग समझ ले न धन को सब कुछ और भूल जाए न मन की बातें
यही बताने धरा पे आया सुदामा का बन के यार कान्हा।

2-जगत को अपने स्वरुप - लीला से था लुभाने ही आया कान्हा
है सत्य आत्मा जगत है मिथ्या हमें बताने ही आया कान्हा
कभी किसी को न समझो छोटा नहीं वो छोटे जो दिख रहे है
कि पांच पांडव के संग मिल कर उन्हें जिताने ही आया कान्हा।

3 हज़ारों गोपियों  संग राधा व रुकमिनी का सिंगार कान्हा
जो राधिका को था उनसे जोड़े वो मन से मन का था तार कान्हा
वो चाहे मीरा हो या कि राधा या गोपियाँ हो या मित्र ही हों
सकल चराचर को आया देने था प्यार ही प्यार - प्यार कान्हा।

©लोकेन्द्र मणि मिश्र " दीपक"

शुक्रवार, 18 मई 2018

पतवार छोड़ दोगे तो साहिल न मिलेगा

पतवार छोड़ दोगे तो साहिल न मिलेगा।
अखबार में कातिल कभी कातिल न मिलेगा।

मिल जाये एक बार तो फिर थाम लो उसे
हर बार किसी से ये कभी दिल न मिलेगा।

शब आई है तो आएगी निश्चित ही सहर भी
ये बात सच नहीं है कि झिलमिल न मिलेगा।

सुधियों में तेरे जिस तरह खोया रहा हूँ मैं
हर शख़्स तुम्हे इस क़दर ग़ाफ़िल न मिलेगा।

"दीपक" के हौंसले को डिगा दे कोई तूफां
तूफान कोई इतना तो काबिल न मिलेगा।

~लोकेन्द्र मणि मिश्र "दीपक"

गुरुवार, 26 अप्रैल 2018

तुम मुझको आवाज़ दो तो सही

1रुक के तुम मुझको आवाज दो तो सही।
एक पावन सा अहसास दो तो सही।
मैं जहां हूँ वहीं तुमको ले आऊंगा
अपने आने का आभास दो तो सही।

2 इस जमीं पर ही आकाश मिल जाएगा।
पतझड़ों में भी मधुमास मिल जायेगा।
इश्क़ की गर ख़ुदा सी इबादत करो
आस ही पास वो तुमको मिल जाएगा।

3 एक ऐसी किताब जो जाऊँ।
सूखे दरिया में आब हो जाऊँ।
मुझको ऐसा बना मेरे मौला
उसकी आँखों का ख्वाब हो जाऊँ।

4 उसने कहा जो कुछ तो मैं पागल सा हो गया।
पानी भरे हुए किसी बादल सा हो गया।
दुनिया के रंजो गम से न कुछ भी हुआ मुझे
उसकी बस एक नज़र से ही घायल सा हो गया।