शुक्रवार, 29 दिसंबर 2017

अंधेरे हैं आखिर कभी तो मिटेंगे

गिरेंगे , उठेंगे औ मीलों चलेंगे
सफर के मुसाफ़िर कभी ना रुकेंगे।

यही सोचकर साथ चलते रहे हैं
नदी के किनारे कभी तो मिलेंगे

ये माना के तूफ़ां बहुत तेज है पर
ये आंधी ये तूफ़ां कभी तो थमेंगे।

जरा साथ बैठो हमारे भी कुछ पल
हम' अपनी कहेंगे तुम्हारी सुनेंगे।

जलेगा ये "दीपक" क़यामत की शब तक
अंधेरे हैं आखिर, कभी तो मिटेंगे।

~लोकेन्द्र मणि मिश्र "दीपक"

गुरुवार, 28 दिसंबर 2017

एक संस्मरण :आद्या चचा

आद्या चचा नहीं रहे.....आज सुबह वो इस दुनिया को छोड़ कर उस दुनिया मे चले गये जहां सबको एक न एक दिन जाना ही है..
आज से सात आठ साल पहले का एक दृश्य आंखों के सामने घूम रहा है। रामलीला चल रही थी  धनुषयज्ञ का प्रकरण था। तमाम योद्धा धनुष को हिला भी नहीं सके थे। जनक जी का संवाद आया " हे द्वीप- द्वीप के राजागण हम किसे कहें बलशाली है......." । ये एक पिता की आवाज थी जिसके पुत्री के स्वयंवर में किसी भी वीर ने उसकी प्रतिज्ञा के अनुरूप शिव के महान धनुष को तोड़ना तो दूर हिला भी नहीं सके थे। ये संवाद इतना सजीव प्रतीत होता था कि सब इसमें खो जाते थे। और संवाद के अंत के जनक जी के आंखों में पानी हुआ करता था । ये जनक थे "श्री आद्यानन्द मिश्र" यानी कि "आद्या चचा" ।
चाहे मारीच का रोल हो या जनक का या फिर विश्वामित्र का ये सब मे फिट थे।
गांव में कुछ लोग इन्हें नेता जी भी कहते थे, ये अकेले ऐसे नेता थे जो कभी भी चुनाव नहीं लड़े। लेकिन जिस भी प्रत्यासी की तरफ खड़े हो जाते उसका पलड़ा भारी हो जाता था। गांव के हर काम मे आगे रहने वाले चाहे राजनीति हो या किसी के कोर्ट कचहरी का काम सबमे साथ देने वाले गांव के ये इकलौते आदमी थे। संविधान की अनगिनत धाराएं इन्हें मुंहजबानी याद थी। एकबार किसी बात पर इनकी दरोगा से बहस हो गई, इन्होंने कई बार दरोगा जी को समझाया लेकिन वो समझने को तैयार नहीं था और भरे बाज़ार में आपने उसे थप्पड़ जड़ दिया था क्योंकि यहां बात सम्मान की थी और गांव की।

ठीक ठीक समय याद नहीं आ रहा शायद 2013 की बात है । में उनके पास गया और पूछा कि चचा आज जनक बनेंगे आप? आपकी तबियत तो ठीक नहीं है।
आप कांप रहे थे, तबियत खराब थी लगभग 1 हफ्ते पहले ही मेडिकल कॉलेज से आये थे लेकिन आपने कहा था कि कोशिश करते हैं और आपने कोशिश की आप जनक बने और फिर वही दृश्य खड़ा हो गया। डायलॉग का अंत आते आते आप की आवाज रुँध गयी थी। आंखों में पानी तब भी था और दर्शक तब भी स्तब्ध खड़े थे उसके बाद फिर कभी धनुषयज्ञ के दिन वैसा दृश्य देखने को नहीं मिला। अब न तो वैसी आवाज है और न ही वो दम।
वो आपका अंतिम अभिनय था रामलीला में । अब चलने और बोलने में भी हांफने लगे थे आप। अस्थमा हो गया था और उसके साथ साथ हृदय रोग और तमाम सारी बीमारियाँ।
गांव में कोई भी पंचायत आपके बिना नहीं होती थी। हर पंचायत में जो एक आदमी हमेशा मौजूद रहता था वो आप थे। कभी भी अपने कहे से डिगते नहीं थे जो कहा वो कहा फिर कोई उसे काट नहीं सकता था। क्योंकि कोसी के पास सामर्थ्य नहीं था आपके तर्कों को काटने का। एक निष्पक्ष निर्भीक और अटल नेता तथा एक   सधा हुआ अभिनेता आप ही थे। मुझे याद है 2007 में जब मैं 13 वर्ष का था तो सुरेश चचा में मुझे अंगद रावण सम्वाद के दिन अंगद बनने को कहा था। चूंकि में छोटा था तो लोगों ने कहा कि एक बार रिहर्सल हो जाये , कुबेर बाबा के ओसारा में गांव के कई लोग इकट्ठा हुए जिसमे सुरेश चचा, कमलेश भईया, छोटकू भईया, रामनोहर भईया , महेश बाबा और आप भी थे। आप थोड़ा लेट आए थे और आपने कहा कि इतने छोटे लड़के को तुमलोग बना रहे हो इसको कुछ याद भी है ये ठीक से बोल भी पायेगा। इस पर सुतेश चचा ने कहा कि हां ये बोल लेगा अभी हमलोग रिहर्सल कर के देखे हैं। फिर आपने मेरे टेस्ट लिया था एक दो चौपाई का अर्थ पूछा था आपने और राधेश्याम रामायण का डायलॉग सुना था, जब आप आश्वस्त हो गए तब लगभग रात को 12 बजे रिहर्सल बन्द हुआ था। और अगले दिन अंगद रावण संवाद यादगार रहा था।
आपकी पीढ़ी में ऐसा कोई भी नहीं है जो आपका स्थान ले सके और हमारी पीढ़ी में तो ऐसा कोई सवाल ही नहीं उठता। आपका जाना पूरे गांव के लिये एक अपूरणीय क्षति है। अब हमें आपकी आवाज में "हे द्वीप- द्वीप के राजागण हम किसे कहें बलशाली है......" सुनने को नहीं  मिलेगा। ईश्वर आपकी आत्मा को शांति दे और पूरे गांव को इस दुख से उबरने की शक्ति।

~लोकेन्द्र मणि मिश्र "दीपक"

बुधवार, 27 दिसंबर 2017

कल्पना बनाम भोजपुरी बनाम प्रभात खबर

कल्पना बनाम भोजपुरी

भोजपुरी फिल्मों और गानों को अश्लीलता किसी से भी छिपी नहीं है। बेशक़ आज भोजपुरी में कुछ अच्छे काम हो रहे हैं शार्ट फ़िल्म्स के माध्यम से और कुछ संस्थाओं द्वारा सोशल मीडिया में भी प्रयास किये जा रहे हैं लेकिन भोजपुरी की छवि जो पिछले 15-16 सालों में खराब हुई है उसे इतनी जल्दी से नहीं सुधारा जा सकता। भोजपुरी गीत संगीत की जो छवि आज है उसमें कल्पना पटवारी का योगदान अमूल्य है.. गमछा बिछा के दिल मांगना से ले के चढ़ल जवानी रसगुल्ला किसी से भी छिपा नहीं है। आजकल एक वीडियो वायरल हो रहा है जिसमे आपके ही प्रिय दर्शकों ने आपके उन्हीं गीतों को गाने के लिये कहा है और आप उसपे चिढ़ जाती हैं। क्या आपको पता ह उनकी येे फरमाइश आपकी ही देन है । वो भरत शर्मा या शारदा सिन्हा से ये फरमाईस नहीं कर सकते हैं उन्हें मालूम है। आपको व्व उन्हीं गानों के पर्याय के रूप में देखते हैं न कि भिखारी ठाकुर और महेन्दर मिसिर के गीतों के गायिका के रूप में। अपमान किसी का भी नहीं होना चाहिए ये सच है लेकिन यदि उस अपमान का कारण खुद आपके ही द्वारा किये गए कुछ काम हों तो फिर इस अपमान को भी आपको स्वीकारना ही होगा। दूसरी बात ये की अगर आप ये सोच रहीं हैं कि भिखारी ठाकुर के गीतों को गा कर आपके सभी अश्लील गानों के पाप धूल जायेंगे तो आप ये भूल जाईये क्योंकि आपके पुराने गानों के भक्त  आपके इस प्रायश्चित में आपके साथ बिल्कुल भी नहीं हैं।
तीसरी बात प्रभात खबर अखबार के लिये.... पत्रकारिता का पतन तो हम देख ही रहे हैं, टीवी पर समाचारों का मतलब TRP और समाचारपत्रों में खबरों का मतलब  विज्ञापन । इस दौर में आपका अखबार भो क्यों पीछे रहता सो आपने भी बहती गंगा में हाथ धो लिया। आपके खबर की शुरुआत होती है
"कल्पना ने भोजपुरी के लिए जो त्याग किया है वो अतुलनीय है"
क्या इस लाइन का कोई आधार है? या फिर आपको अच्छा लगा इसलिये छाप दिया? खैर केबिन में बैठकर खबर लिखने वाले पत्रकारों और संपादकों से ये गलतियां तो होनी ही है। आपको अगर टेबल पर बैठकर हो पत्रकारिता करनी है तो एक सुझाव है मेरी तरफ से यूट्यूब खोलिये और कल्पना पटवारी सर्च कीजिये फिर आपको पता चलेगा कि कल्पना ने क्या योगदान दिया है। तब आपकी खबर कुछ ऐसा होगी
" कल्पना का भोजपुरी के पतन में अतुलनीय योगदान है"।

धन्यवाद!
लोकेन्द्र मणि मिश्र "दीपक"

गुरुवार, 7 दिसंबर 2017

ज़िन्दगी

एकबार चलि गईल त ना आवेले ज़िन्दगी

खेला अज़ब ग़ज़ब के देखावेले ज़िन्दगी
एक बार चलि गईल त ना आवेले ज़िन्दगी

केतनो अमीर होखे केतनो गरीब होखे
सभकर अईंठि के कान नचावेले ज़िन्दगी।

खोजला प ना किताब में मिले जवन कबो
अदमी के हर ऊ पाठ पढ़ावेले ज़िन्दगी।

नफ़रत के बोरा बान्हि के कुईयाँ में फेंकि द
सबसे करs तूँ प्यार बतावेले ज़िन्दगी।

आइल बा जे ऊ जाई केहूs भुलाय ना
जा-जा के रोज सबके सीखावेले ज़िन्दगी।

~लोकेंद्र मणि मिश्र "दीपक"

बुधवार, 6 दिसंबर 2017

कम से कम रस्ता तो है..

है भले दुश्वार लेकिन कम से कम रस्ता तो है
यूँ दिखाई दे न दे पर ख्वाब में दिखता तो है।

जिसको तुमने ये कहा था लिखना पढ़ना छोड़ तो
शुक्र है वो आदमी छुप- छुप के ही लिखता तो है।

तुम सियासतदां हो फिर अनजान बनते हो मियाँ
इस गली में कोई भी हो आदमी बिकता तो है।

आँधियों में जब मशालें बुझ गईं चारो तरफ
टिमटिमाकर ही सही पर एक दिया जलता तो है।

रहगुज़र को धूप में इस बात से राहत मिली
शाख़ पर का एक पत्ता ही सही हिलता तो है।

~लोकेंद्र मणि मिश्र "दीपक"