शुक्रवार, 29 दिसंबर 2017

अंधेरे हैं आखिर कभी तो मिटेंगे

गिरेंगे , उठेंगे औ मीलों चलेंगे
सफर के मुसाफ़िर कभी ना रुकेंगे।

यही सोचकर साथ चलते रहे हैं
नदी के किनारे कभी तो मिलेंगे

ये माना के तूफ़ां बहुत तेज है पर
ये आंधी ये तूफ़ां कभी तो थमेंगे।

जरा साथ बैठो हमारे भी कुछ पल
हम' अपनी कहेंगे तुम्हारी सुनेंगे।

जलेगा ये "दीपक" क़यामत की शब तक
अंधेरे हैं आखिर, कभी तो मिटेंगे।

~लोकेन्द्र मणि मिश्र "दीपक"

गुरुवार, 28 दिसंबर 2017

एक संस्मरण :आद्या चचा

आद्या चचा नहीं रहे.....आज सुबह वो इस दुनिया को छोड़ कर उस दुनिया मे चले गये जहां सबको एक न एक दिन जाना ही है..
आज से सात आठ साल पहले का एक दृश्य आंखों के सामने घूम रहा है। रामलीला चल रही थी  धनुषयज्ञ का प्रकरण था। तमाम योद्धा धनुष को हिला भी नहीं सके थे। जनक जी का संवाद आया " हे द्वीप- द्वीप के राजागण हम किसे कहें बलशाली है......." । ये एक पिता की आवाज थी जिसके पुत्री के स्वयंवर में किसी भी वीर ने उसकी प्रतिज्ञा के अनुरूप शिव के महान धनुष को तोड़ना तो दूर हिला भी नहीं सके थे। ये संवाद इतना सजीव प्रतीत होता था कि सब इसमें खो जाते थे। और संवाद के अंत के जनक जी के आंखों में पानी हुआ करता था । ये जनक थे "श्री आद्यानन्द मिश्र" यानी कि "आद्या चचा" ।
चाहे मारीच का रोल हो या जनक का या फिर विश्वामित्र का ये सब मे फिट थे।
गांव में कुछ लोग इन्हें नेता जी भी कहते थे, ये अकेले ऐसे नेता थे जो कभी भी चुनाव नहीं लड़े। लेकिन जिस भी प्रत्यासी की तरफ खड़े हो जाते उसका पलड़ा भारी हो जाता था। गांव के हर काम मे आगे रहने वाले चाहे राजनीति हो या किसी के कोर्ट कचहरी का काम सबमे साथ देने वाले गांव के ये इकलौते आदमी थे। संविधान की अनगिनत धाराएं इन्हें मुंहजबानी याद थी। एकबार किसी बात पर इनकी दरोगा से बहस हो गई, इन्होंने कई बार दरोगा जी को समझाया लेकिन वो समझने को तैयार नहीं था और भरे बाज़ार में आपने उसे थप्पड़ जड़ दिया था क्योंकि यहां बात सम्मान की थी और गांव की।

ठीक ठीक समय याद नहीं आ रहा शायद 2013 की बात है । में उनके पास गया और पूछा कि चचा आज जनक बनेंगे आप? आपकी तबियत तो ठीक नहीं है।
आप कांप रहे थे, तबियत खराब थी लगभग 1 हफ्ते पहले ही मेडिकल कॉलेज से आये थे लेकिन आपने कहा था कि कोशिश करते हैं और आपने कोशिश की आप जनक बने और फिर वही दृश्य खड़ा हो गया। डायलॉग का अंत आते आते आप की आवाज रुँध गयी थी। आंखों में पानी तब भी था और दर्शक तब भी स्तब्ध खड़े थे उसके बाद फिर कभी धनुषयज्ञ के दिन वैसा दृश्य देखने को नहीं मिला। अब न तो वैसी आवाज है और न ही वो दम।
वो आपका अंतिम अभिनय था रामलीला में । अब चलने और बोलने में भी हांफने लगे थे आप। अस्थमा हो गया था और उसके साथ साथ हृदय रोग और तमाम सारी बीमारियाँ।
गांव में कोई भी पंचायत आपके बिना नहीं होती थी। हर पंचायत में जो एक आदमी हमेशा मौजूद रहता था वो आप थे। कभी भी अपने कहे से डिगते नहीं थे जो कहा वो कहा फिर कोई उसे काट नहीं सकता था। क्योंकि कोसी के पास सामर्थ्य नहीं था आपके तर्कों को काटने का। एक निष्पक्ष निर्भीक और अटल नेता तथा एक   सधा हुआ अभिनेता आप ही थे। मुझे याद है 2007 में जब मैं 13 वर्ष का था तो सुरेश चचा में मुझे अंगद रावण सम्वाद के दिन अंगद बनने को कहा था। चूंकि में छोटा था तो लोगों ने कहा कि एक बार रिहर्सल हो जाये , कुबेर बाबा के ओसारा में गांव के कई लोग इकट्ठा हुए जिसमे सुरेश चचा, कमलेश भईया, छोटकू भईया, रामनोहर भईया , महेश बाबा और आप भी थे। आप थोड़ा लेट आए थे और आपने कहा कि इतने छोटे लड़के को तुमलोग बना रहे हो इसको कुछ याद भी है ये ठीक से बोल भी पायेगा। इस पर सुतेश चचा ने कहा कि हां ये बोल लेगा अभी हमलोग रिहर्सल कर के देखे हैं। फिर आपने मेरे टेस्ट लिया था एक दो चौपाई का अर्थ पूछा था आपने और राधेश्याम रामायण का डायलॉग सुना था, जब आप आश्वस्त हो गए तब लगभग रात को 12 बजे रिहर्सल बन्द हुआ था। और अगले दिन अंगद रावण संवाद यादगार रहा था।
आपकी पीढ़ी में ऐसा कोई भी नहीं है जो आपका स्थान ले सके और हमारी पीढ़ी में तो ऐसा कोई सवाल ही नहीं उठता। आपका जाना पूरे गांव के लिये एक अपूरणीय क्षति है। अब हमें आपकी आवाज में "हे द्वीप- द्वीप के राजागण हम किसे कहें बलशाली है......" सुनने को नहीं  मिलेगा। ईश्वर आपकी आत्मा को शांति दे और पूरे गांव को इस दुख से उबरने की शक्ति।

~लोकेन्द्र मणि मिश्र "दीपक"

बुधवार, 27 दिसंबर 2017

कल्पना बनाम भोजपुरी बनाम प्रभात खबर

कल्पना बनाम भोजपुरी

भोजपुरी फिल्मों और गानों को अश्लीलता किसी से भी छिपी नहीं है। बेशक़ आज भोजपुरी में कुछ अच्छे काम हो रहे हैं शार्ट फ़िल्म्स के माध्यम से और कुछ संस्थाओं द्वारा सोशल मीडिया में भी प्रयास किये जा रहे हैं लेकिन भोजपुरी की छवि जो पिछले 15-16 सालों में खराब हुई है उसे इतनी जल्दी से नहीं सुधारा जा सकता। भोजपुरी गीत संगीत की जो छवि आज है उसमें कल्पना पटवारी का योगदान अमूल्य है.. गमछा बिछा के दिल मांगना से ले के चढ़ल जवानी रसगुल्ला किसी से भी छिपा नहीं है। आजकल एक वीडियो वायरल हो रहा है जिसमे आपके ही प्रिय दर्शकों ने आपके उन्हीं गीतों को गाने के लिये कहा है और आप उसपे चिढ़ जाती हैं। क्या आपको पता ह उनकी येे फरमाइश आपकी ही देन है । वो भरत शर्मा या शारदा सिन्हा से ये फरमाईस नहीं कर सकते हैं उन्हें मालूम है। आपको व्व उन्हीं गानों के पर्याय के रूप में देखते हैं न कि भिखारी ठाकुर और महेन्दर मिसिर के गीतों के गायिका के रूप में। अपमान किसी का भी नहीं होना चाहिए ये सच है लेकिन यदि उस अपमान का कारण खुद आपके ही द्वारा किये गए कुछ काम हों तो फिर इस अपमान को भी आपको स्वीकारना ही होगा। दूसरी बात ये की अगर आप ये सोच रहीं हैं कि भिखारी ठाकुर के गीतों को गा कर आपके सभी अश्लील गानों के पाप धूल जायेंगे तो आप ये भूल जाईये क्योंकि आपके पुराने गानों के भक्त  आपके इस प्रायश्चित में आपके साथ बिल्कुल भी नहीं हैं।
तीसरी बात प्रभात खबर अखबार के लिये.... पत्रकारिता का पतन तो हम देख ही रहे हैं, टीवी पर समाचारों का मतलब TRP और समाचारपत्रों में खबरों का मतलब  विज्ञापन । इस दौर में आपका अखबार भो क्यों पीछे रहता सो आपने भी बहती गंगा में हाथ धो लिया। आपके खबर की शुरुआत होती है
"कल्पना ने भोजपुरी के लिए जो त्याग किया है वो अतुलनीय है"
क्या इस लाइन का कोई आधार है? या फिर आपको अच्छा लगा इसलिये छाप दिया? खैर केबिन में बैठकर खबर लिखने वाले पत्रकारों और संपादकों से ये गलतियां तो होनी ही है। आपको अगर टेबल पर बैठकर हो पत्रकारिता करनी है तो एक सुझाव है मेरी तरफ से यूट्यूब खोलिये और कल्पना पटवारी सर्च कीजिये फिर आपको पता चलेगा कि कल्पना ने क्या योगदान दिया है। तब आपकी खबर कुछ ऐसा होगी
" कल्पना का भोजपुरी के पतन में अतुलनीय योगदान है"।

धन्यवाद!
लोकेन्द्र मणि मिश्र "दीपक"

गुरुवार, 7 दिसंबर 2017

ज़िन्दगी

एकबार चलि गईल त ना आवेले ज़िन्दगी

खेला अज़ब ग़ज़ब के देखावेले ज़िन्दगी
एक बार चलि गईल त ना आवेले ज़िन्दगी

केतनो अमीर होखे केतनो गरीब होखे
सभकर अईंठि के कान नचावेले ज़िन्दगी।

खोजला प ना किताब में मिले जवन कबो
अदमी के हर ऊ पाठ पढ़ावेले ज़िन्दगी।

नफ़रत के बोरा बान्हि के कुईयाँ में फेंकि द
सबसे करs तूँ प्यार बतावेले ज़िन्दगी।

आइल बा जे ऊ जाई केहूs भुलाय ना
जा-जा के रोज सबके सीखावेले ज़िन्दगी।

~लोकेंद्र मणि मिश्र "दीपक"

बुधवार, 6 दिसंबर 2017

कम से कम रस्ता तो है..

है भले दुश्वार लेकिन कम से कम रस्ता तो है
यूँ दिखाई दे न दे पर ख्वाब में दिखता तो है।

जिसको तुमने ये कहा था लिखना पढ़ना छोड़ तो
शुक्र है वो आदमी छुप- छुप के ही लिखता तो है।

तुम सियासतदां हो फिर अनजान बनते हो मियाँ
इस गली में कोई भी हो आदमी बिकता तो है।

आँधियों में जब मशालें बुझ गईं चारो तरफ
टिमटिमाकर ही सही पर एक दिया जलता तो है।

रहगुज़र को धूप में इस बात से राहत मिली
शाख़ पर का एक पत्ता ही सही हिलता तो है।

~लोकेंद्र मणि मिश्र "दीपक"

शुक्रवार, 15 सितंबर 2017

अभियन्ता दिवस विशेष


आज इंजीनियर्स डे है। सबसे पहले सभी इंजीनियरों को शुभकामनायें साथ ही साथ उनको भी शुभकामनायें जो अगले साल दो साल में इंजीनियर बन जायेंगे। एक इंजीनियर की लाइफ क्या होती है ये आपको इंजीनियर के ऊपर बने जोक्स पढ़कर नही बल्कि चार साल में 48 किताबें पढ़कर पता चलेगा।आज तो ये है की जो एक सीधा लाइन भी नहीं खींच पाता है वो भी कुछ भी बोल देता है आके देखो कभी इंजीनियरिंग ड्राइंग बनाके ...... न हो गया तो बताना। (....... के स्थान पर अपने विवेक से उचित शब्द भर लें). जिसने जिंदगी में कार्बन कॉपी के बिना कोई परीक्षा ही नहीं दी वो भी पूछता है भाई कितने बैक आये? खैर इंजीनयरिंग के बारे में ज्यादे कुछकह पाना मेरे लिए तो सम्भव नही है। इंजीनियरिंग एक सीधे - सादे लड़के को इस लायक बनाता है की कोई वो इस जमाने में जी सके । खैर ज्यादा गम्भीर बातें नही कहुंगा सिर्फ इतना कहुंगा की आज आप मेरे इस पोस्ट को पढ़ पा रहे हैं तो उसके पीछे भी एक इंजीनियर का ही दिमाग है। शायद आप अपने बैडरूम या ड्राइंग रूम में बैठकर ये पोस्ट पढ़ रहे हों तो जरा अपनी नज़रें इधर उधर के सामानों पर दौड़ाइए ना आपके आसपास के 60-70% चीजें किसी इंजीनियर के दिमाग की ही देन है। अगर इंजीनियर न होते तो विज्ञान सिर्फ एक थ्योरी होती। आज भी हम बैलगाड़ी से चल रहे होते(हांलाकि बैलगाड़ी में भी इंजीनियरिंग है) । दिन में दस बार हेल्लो बेबी ,हेल्लो जानू हेल्लो हनी कहने वाली पीढ़ी महीने में एक बार आने वाले अन्तरदेशी पत्र पर ही टिकी होती। क्या क्या लिखूँ ..... आगे से किसी एयर कंडीशन गाडी में बैठकर या किसी एयर कन्डीशन कमरे में लगे एलसीडी स्क्रीन पर अपने परिवार के साथ किसी मूवी का आनन्द लेते समय आपके मोबाइल पर आये किसी इंजीनियरिंग वाले जोक्स को पढ़कर हंसने से पहले जरा एक मिनट रुककर सोचियेगा जरूर।

सर एम . विश्वेश्वरैया को नमन।

~लोकेन्द्र मणि मिश्र "दीपक"

शुक्रवार, 30 जून 2017

तुलसी इस संसार में......

आदमी अपने स्वाभाव से ही जाना जाता है। परसाई जी ने कहा था "मनुष्य अपने दुःख  से उतना दुःखीनहीं होता जितना की दूसरे के सुख से". हमारे चारो तरफ कुछ ऐसे लोग मिल जायेंगे जिनका काम सिर्फ मज़ा लेना होता है ऐसी ही एक शख्शियत हैं ख्यातिभूषण जी । आप नब्बे के दशक डिप्लोमाधारी इंजीनियर हैं और आप फ़िलहाल एक ठेकेदारी इंजीनियर हैं। ठेकेदारी इंजीनियर ?? अरे नही नही ये कोई ब्रांच नहीं है बल्कि वह इंजीनियर जो स्वयं ठेकेदार भी हो उसको ठेकेदारी इंजीनियर कहते हैं। एक बार की बात है ख्यातिभूषण जी खाली समय में अपने बारामदे में आरामकुर्सी डाले आराम फ़रमा रहे थे लेकिन चूँकि इनके स्वाभाव में ही चुल्ल है इसलिये ये आराम करना इन्हे नागवार गुज़रने लगा। इनका हाथ अपने सैमसंग j7 पर गया और कॉन्टेक्ट लिस्ट में आँखे किसी नम्बर को ढूंढने लगीं। नम्बर लगा , फोन उठा और बातचीत शुरू होई । गाँव के पुरुब टोला से लगाय दक्खिन टोला तक का हाल चाल पूछने के बाद और आजकल क्या हो रहा है ? का भारी भरकम सवाल दागा। ये जो सवाल हैं न, ये सवाल जख़्म पे नमक रगड़ने वाला होता है। हो क्या रहा है , बेरोजगारी है अब क्या बतायें आप तो सब जानते ही हैं। उधर से आवाज आई। जिस प्रकार बगुला जल में मछली की ताक में नज़रें गड़ाये रहता है ख्यातिभूषण जी भी इसी जवाब को सुनने के लिए फ़ोन करते थे। आप चिंता मत करिये भईया इसी महीने के लास्ट में एक नया प्रोजेक्ट मिल रहा है आपको जल्दिये बुलाते हैं यहीं रहियेगा बढ़िया पैसा मिलेगा और हम तो हैं ही यहाँ।  आपका बहुत एहसान है हमलोगों पर। ख्याति भूषण जी ने कहा। ये वही डायलॉग है जो वो हमेशा बेरोजगारी वाली बात के बाद कहते थे। एक बार फिर बाग़ - बगइचा, नहर - कूड़ही का हाल चाल पूछने के बाद परनाम कह कर फोन रख देते हैं ख्याति भूषण जी। अब अगला फोन अपने दूर के भतीजे के पास करते है फिर वही हाल चाल ओखर- मूसर बतियाने के बाद नोकरी का जबरदस्त ऑफर देने लगते हैं। इनकी बाते सुनकर ऐसा लगता है जैसे कर्मचारी चयन आयोग की ठेकेदारी भी इन्ही के पास आ गयी है। अब पिछले फोन वाले भईया के बारे में बताने लगते हैं जानते हो यार अभी गाँव से टुन्ना भईया का फोन आया था परेशान कर के रख दिये हैं रोज सुबह शाम नोकरी के लिए फ़ोन करते हैं, जब पढ़ना - लिखना था तब तो ये लोग कुछ किये नहीं और अब हमारे पीछे पड़े रहते हैं। भतीजा इनकी नस - नस से वाकिफ़ था वो जानता था की फ़ोन किसने किया होगा और नौकरी का ऑफर किसने दिया होगा। अब ख्यातिभूषण एक - एक कर सबका हाल पूछने लगे फलां चाचा कैसे हैं? फलां भईया कैसे है ? बेचारा भतीजा रोज रोज के टॉर्चर से तंग आ गया था उसने कहा चचा एक बार व्हाट्सएप्प पर आइये तो। फिर अपनी पूरी कॉन्टेक्ट लिस्ट कॉपी करके व्हाट्सएप्प पर भेज दिया और कहा आज के बाद हमसे पूरे जवार का हाल चाल मत पूछियेगा सबका नम्बर है फोन कर के पूछ लीजिये। चचा ने उस दिन से भतीजे को फेसबुक और व्हाट्सएप्प पर ब्लाक कर दिया। अब भतीजा मज़े में है और एक मल्टीनेशनल फर्म में एडवाइजर है।वो अपनी सफलता के श्रेय का कुछ हिस्सा अब भी ख्यातिभूषण जी को देता है की अगर उन्होंने ब्लाक नहीं किया होता तो वो रोज़ एक नयी नौकरी दिलाते और रोज़ समय ख़राब करते। वो नौकरी का ऑफर इस तरह से देते थे जैसे लगता था की वाह अब तो नौकरी मिल गयी । खैर भतीजे ने भी एक उपकार तो चाचा जी पर किया ही था कॉन्टेक्ट लिस्ट भेजकर । जिसे भी वो नौकरी दिलाने की बात करते थे आज वो सब लोग अपनी काबिलियत के बल पर नौकरी या छोटा - मोटा बिज़नेस करते हैं और खुश हैं। जिनकी नौकरी लग  गयी है उनके पास ख्यातिभूषण जी का कॉल नही आता है। लेकिन चूँकि मनुष्य का स्वाभाव कभी नहीं बदलता है , आज भी ख्यातिभूषण की नज़रे अपने कॉन्टेक्ट लिस्ट के बेरोज़गारों को खोजती रहती हैं और फिर शुरू होता है एक और जाल का फेंकना और कुछ बेरोज़गारों को फँसा कर उनका समय खराब करना।

ध्यान से देखिये आपके आसपास भी कोई ख्यातिभूषण मिल ही जायेंगे।

~लोकेन्द्र मणि मिश्र "दीपक"

रविवार, 14 मई 2017

Happy Mother's Day

माँ को शब्दों में नही बाँधा जा सकता। माँ एक लफ़्ज नही एक संसार है । एक व्यक्ति नही एक व्यक्तित्व है। माँ प्रकृति है जो सिर्फ देना जानती है।

1
किसी आँगन में अम्मा की हँसी जब छूट जाती है।
तो खुशियों के नदी की बांध जैसे टूट जाती है।
दुखा कर दिल कभी आबाद रह पाया नहीं कोई
कि खुशियां दूर हो जाती जो अम्मा रूठ जाती है।

2
वो चूल्हे पर पतीले में चढ़ा कर दाल बैठी है
हमारे हर ग़मो को वो ख़ुशी में ढाल बैठी है
बुरी नज़रो हमारे पास आने से प्रथम सुन लो
हमारी माँ तुम्हारे वास्ते बन काल बैठी है।

3
कैसे शब्दों में तुझे बांधे कलम हैरान है .
स्वर्ग से बढकर सदा अम्मा तेरा स्थान है .
जब कभी बाधाओं -विघ्नों नें मुझे  घेरा है तब
सच कहूं  मां लब पे मेरे बस तुम्हारा नाम है .

4
मां भोर की उजास है
 दु:ख में भी सुख की आस है
मां दिल के सबसे पास है
मां दिल की एक अहसास है
जो दूर रहकर पास है
जो दिल की एक आवाज है
जो निराश मन की आश है
जो प्यार की एहसास है
वो और कुछ है ही नहीं
बस मां की एक आवाज है
इस अन्धेरे में दिखाई पड़ रहा जो प्रकाश है
वो मेरी मां का मेरे प्रति विश्वास है ,जो खास है
मेरेमन मे विजय का जो तनिक भी विश्वास है
वो इसलिये की साथ मेरे मां का आशीर्वाद है .
आज "दीपक " जल रहा और दे रहा जो प्रकाश है
उस लौ में है जो रौशनी वह मां का ही विश्वास है .

© लोकेन्द्र मणि मिश्र"दीपक"
lOve U  MaA


मंगलवार, 2 मई 2017

शहीद सैनिक और उसकी पत्नी की आखिरी बातचीत

शहीद सैनिक और उसकी पत्नी के बीच अगर आखिरी बार बात होती तो शायद यही होती

वीर सैनिक की पत्नी:

सुबह फोन पर यही कहा था जल्दी घर को आऊंगा
और तुम्हारी खातिर बेटे नये खिलौने लाऊंगा।

ऐ जी तुमको देखे जाने कितने ही दिन बीत गये
जीवन में विष ही विष है, लगता अमृत घट रीत गये।

तुमने यही कहा था बहना की शादी में आओगे
बबुआ की खातिर कपड़े और मेरी साड़ी लाओगे।

फिर क्यों अपना वादा आज निभाना भूल गये हो जी
हमे छोड़ कर आखिर हमसे क्योंकर दूर गये हो जी

पत्नी को लगता है जैसे सैनिक बोल रहा है....

तुमसे दूर कहाँ जाऊँगा सात जन्म का बन्धन है
प्यार हमारा और तुम्हारा पावन है ज्यों चन्दन है।

लेकिन सब धर्मों से ऊपर राष्ट्र धरम वो मेरा था
जब दुश्मन ने भारत माता की माटी को घेरा था।

माता पर जो आँख उठे वो आँख फोड़ना होता है
हाथ उठाता है जो उसका हाथ तोडना होता है।

हम सब तो तैयार खड़े थे पिस्टल थामे बाँहों में
मगर कहीं आदेश पड़ा था राजभवन की राहों में।

कभी पीठ पर गोली हमने खाई थी ना खाई है
हर जवान की मौत की खातिर दिल्ली उत्तरदायी है।

भारत माँ के आँचल पर जो हाथ लगाने आयेगा
सबसे पहला वार हमारे सीने से टकरायेगा।

प्रियतम विदा करो अब मुझसे अधिक न बोला जाता है
हंसते हंसते ही जग से वीरों का टोला जाता है।

~लोकेन्द्र मणि मिश्र "दीपक"
9169041691

मंगलवार, 28 मार्च 2017

पिंजरे में तो केवल रट्टू टोटे रहते हैं..

रोने वालों का क्या है वो रोते रहते हैं
और समय के धन को अक्सर खोते रहते हैं।

दूर जिन्हें जाना होता वो जाग रहे होते
बात बनाने वाले केवल सोते रहते हैं।

छोटी -छोटी बातों से बिन मतलब डरते हो
अच्छे लोगों पर ये हमले होते रहते हैं।

जिनको केवल बात बनानी है वो सब
बे मतलब के बातों को ही ढोते रहते हैं।

बाज कभी भी क़ैद नही होता "दीपक"
पिंजरे में तो केवल रट्टू तोते रहते हैं।

~लोकेन्द्र मणि मिश्र "दीपक"

रविवार, 19 मार्च 2017

हाईस्कूल के दिन

बोर्ड की परीक्षायें चल रही हैं, इस बीच मुझे अपनी बोर्ड की परीक्षाएं याद आ गईं। मुझे अच्छी तरह याद है जुलाई से दिसम्बर तक मैं मैथ्स और साइंस पढ़ाने वाले मास्टर साहब की खोज करता रहा। पता चला सोहगरा धाम पर एक टीचर हैं जो सीबीएसई बोर्ड  के बच्चों को पढ़ाते हैं। अब सोहगरा मेरे गाँव से था लगभग 12 किमी दूर।  दो बजे स्कूल से घर आते थे और ढाई बजे मैं और रजत घर से सायकिल लेकर निकल जाते थे सोहगरा। अच्छा एक बात कन्फर्म है की जब भी सायकिल से कहीं जाओ तो हवा हमेशा उलटी ही चलती है, जैसे हवा ने कसम खा ली हो की बेटा तुम्हारे बारह किमी  को चौबीस न बनायें तो कहना। जैसे तैसे सोहगरा पहुंचे , मास्टर साहब लुंगी - गंजी में बाहर आये , देखते ही अनिल कपूर की याद आ गयी ,मास्टर साहब बालों की चलती फिरती दूकान थे एकदम। पढ़ाना शुरू किये लगभग एक घण्टे तक पढ़ाये फिर कहा की तुमलोग इतनी दूर मत आया करो थकन हो जाएगी फिर सेल्फ स्टडी नहीं कर पाओगे। खैर हमने भी सोचा की सही कह रहे हैं के दुरी कुछ ज्यादा ही हो रहा है। उसके बाद हमें दिसम्बर में मिले नवीन सिंह मास्टर साहब। हमने कहा सर हमलोग आपसे कोचिंग पढ़ना चाहते है। सर बोले , समय नही है मेरे पास यूपी बोर्ड वालों का कई बैच है बिलकुल टाइम नही मिल पा रहा है। बहुत आग्रह पर इन्होंने कहा की ठीक है पाँच बजे सबेरे आना। बस दिसम्बर की उस कोहरे वाली सड़क पर साइकिल दौड़ाते हम लोग भी पाँच बजने से दस - पन्द्रह मिनट पहले ही पहुँच जाते थे। यहाँ आने पर पता चलता था की सर जी अभी सो रहे हैं, फिर हमलोग उन्हें उठाते। विवेक पानी चलाता और सरजी नहाते तबतक पौने छः हो जाता। फिर दस मिनट हमलोगों को ज्योमेट्री पढ़ने का सौभाग्य प्राप्त होता था । और ठीक छः बजे सर जी दुर्गा मन्दिर के लिए निकल जाते थे क्योंकि वहाँ यूपी बोर्ड का एक बैच लग चुका होता था। लगभग पूरा दिसम्बर हमलोग रोज सुबह दस मिनट मैथ पढ़ते रहे। फिर एक दिन मास्टर साहब बोले मुझे लगा था तुमलोग भाग जाओगे लेकिन तुम लोग तो टिके हो रह गये चलो अब रोज दोपहर ढाई बजे से तीन बजे तक दुर्गा मन्दिर पर तुम लोगों का बैच चलेगा। उस दिन लगा की अब हाईस्कूल में हमारा उद्धार हो जाएगा।फिर रोजाना ढाई बजे हम लोग दुर्गा मन्दिर पहुँच जाते थे।कुछ लोग (जोड़े) वहां दो बजे ही पहुँच जाते थे और आधा घण्टा तक खूब बतियाते थे। इन जोड़ों के साथ एक सिंगल लड़का भी रहता था जो इन कपल्स के झगड़ों का समाधान करता था ।नहीं पहचान पाये ? अरे वही नोकिया 2690 वाला मित्र। कभी कभी सोचता हूँ अगर ये नोकिया 2690 वाला मित्र नहीं होता तो क्या हाइस्कूल के दिन इतने मजेदार होते? गारन्टी नहीं होते। मिलने का टाइम फिक्स कराना, फ़ोन करके झगड़े निपटाना, मिलने का फुलप्रूफ़ इंतज़ाम कराना ये सब यही तो करता था।
दुर्गा मन्दिर मिलने का एक अल्टीमेट पॉइंट था और सबसे ख़ास बात वहां मिलने नहीं पढ़ने जाते थे लोग ये सोचते थे। हांलाकि जो जोड़े वहाँ पढ़ते थे वो पढ़ने में काफी अच्छे थे और हाँ अब भी हैं। नवीन सर की एक खास बात ये थी की शेक्सपीयर का मर्सी और काईंडनेस वाला पैराग्राफ़ उनको कण्ठस्थ था, गणित पढाते पढ़ाते वो कब मर्चेंट ऑफ़ वेनिस और जूलियस शीजर पढ़ाने लगते पता ही नहीं चलता। अब तक जितने भी मैथ्स के टीचर मुझे मिले हैं उनमें सबसे अच्छे टीचर्स में से एक हैं नवीन सर। पढ़ाने का शानदार तरीका। हाँ बोर्ड का लिखा मिटने में पर्याप्त समय लेते थे, रच - रच कर बोर्ड साफ करते थे। हाईस्कूल का टाइम टेबल आ चूका था सेंटर था बेल्थरा में। रोज पेपर के एक दिन पहले जाते थे रात को हमलोग एक चर्च में रुकते थे । शानदार जगह था, पार्क, तालाब, तालाब में तैरते बत्तख़, तरह तरह के फूलों से सजा बागीचा । फिर सुबह एग्जाम देकर हम वापस घर आ जाते थे। आज न जाने क्यूँ ये सब अचानक याद आ गया, कहानियाँ और भी हैं पर अब फिर कभी।

~लोकेन्द्र मणि मिश्र "दीपक"

गुरुवार, 2 मार्च 2017

विवेक और बसंत

बसन्त का आगमन सच कहें तो गाँवों में ही पता चलता है। सरसों और मटर के फूलों से सजकर जब खेत अपने ऊपर गर्व कर रहा होता है तब समझिये की बसन्त अपने चरमोत्कर्ष पर है। बसन्त को ऋतुराज ऐसे ही नहीं कहा गया है। बसन्त और फागुन तो मदमस्त करने वाला मौसम है ही ।आप सोचेंगे की ये पण्डित बसन्त और  फागुन पर निबन्ध क्यों लिख रहा है तो हम बता दें की ये कथा की भूमिका भर है। लॉन्ग लॉन्ग एगो की बात तो नहीं है पर हाँ सन् 2009 -10 की बात है तब हमारे एक मित्र हुआ करते थे ( अब भी हैं😊) जो थोड़े रसिक मिजाज हैं। उनकी रसिक मिजाजी का आलम ये की एक बार क्लास में कागज के एयरोप्लेन पर आई लव यू लिख के दिल का चित्र और उसको छेदते हुए तीर बना कर ऐसा उड़ाए की क्या कहें । पर एक गलती हो गयी उनका हवाईजहाज टारगेट से डिफ्लेक्ट हो कर सीधा गणित वाले सर जी के पास गिरा । अब सर जी हवाईजहाज की राइटिंग मिलाये तो हमारे मित्र गियर में आ गए फिर उनका जो अल्फ़ा - बीटा हुआ की क्या कहें।
नवीं क्लास में इनका दिल आ गया एक खूबसूरत इनकी भाषा में कहें तो कंटास लड़की पर , यही बसन्त -फागुन का मौसम अब ये जब भी उसे देखते इनका दिल बसन्तमय हो जाता और कल्पना में कहीं दूर तक निकल जाते थे। एक दिन सुबह ये स्कूल जल्दी पहुँच गए और संयोग की वो लड़की भी। अब इनका दिल गार्डन गार्डन हो गया और इसके पास वाली सीट पर बैठ गये ,थोड़ी देर चुप रहे फिर बोले आज बहुत अच्छी लग रही हो । तो !!! लड़की बोली । मित्र बोले
अपना नम्बर दो ना ! लिखो 9415****** .अब तो इनको लगा की जैसे इन्हें वो तमाम चीजें मिल गयी जिनकी इन्होंने कल्पना की थी। बस शाम को फोन किये हेलो विवेक बोल रहे हैं , उधर से मीठी सी आवाज आई हैलो कल शाम को मालविया फिल्ड में मिलो न चार बजे तुमसे कुछ बात करनी है। अब इनकी ख़ुशी उस वक्त देखने लायक थी इनको लगा की क्या बात है लड़की सेट हो गयी। शाम चार बजे इत्र  वगैरह लगा के ये मालवीया फिल्ड में पहुंचे उधर वो लड़की भी आई और उसके साथ में था  एक लड़का जो मेरा और इनका भी मित्र था , बोला अरे विवेक कैसे हो ? अभी मेरे मित्र कुछ समझ  पाते उसके पहले ही इनकी दाहिनी कलाई पर एक स्पंज वाला राखी बंध चुका था और ये  आवाक रह गये। बाय कह के वो लड़की अपने बॉयफ्रेंड के साथ जा के फिल्ड में एक कोने में बैठ गयी और हमारे मित्र कलाई को देखते और कभी उस लड़की को। एक वो दिन था और एक आज का दिन उन्हें बसंत - फागुन फूटी आँख भी नहीं सुहाते और सरसो के फूल से तो इतनी नफरत है की मत पूछिये।

~लोकेन्द्र मणि मिश्र "दीपक"