गुरुवार, 18 फ़रवरी 2016

गीत

निष्पक्ष नियंत्रित निर्विकार नूतन समाज का गायक हूँ
कवि दिनकर पंत निराला थे मैं तो बस उनका पायक हूँ

निर्भय होकर लिखूंगा मैं जो कुछ भी खोट तुम्हारी है
लिखता हूँ मैं जिस पीड़ा में उसकी हर चोट तुम्हारी है
कुछ कहते हैं मैं दिशाहीन हो चुके  धनुष का शायक हूँ
निष्पक्ष नियंत्रित ......................

हो सकता है मेरी बातें झूठी हो और ख़याली हो
मेरे लिखे हर शब्द तुम्हे लगते यदि बहुत बवाली हों
हो सकता है सत्य तुम्हे यूँ लगता हो गाली हो
हो सकता है की फरेब के बगिया के तुम माली हो
लेकिन मैं अदना सा कवि
कब कहता हूँ जननायक हूँ

निष्पक्ष नियंत्रित निर्विकार नूतन समाज का गायक हूँ
कवि दिनकर पंत निराला थे मैं तो बस उनका पायक हूँ।

©®लोकेन्द्र मणि  मिश्र "दीपक"
9169041691

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